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Chandra, the Moon God, was cursed to lose his radiant glow because he favored only one of his twenty-seven wives. Desperate and fading, he performed severe penance at Prabhas Patan, where Lord Shiva partially lifted the curse, resulting in the natural waxing and waning of the moon.

सोमनाथ मंदिर की पौराणिक कथा: चंद्र देव का श्राप और ज्योतिर्लिंग की स्थापना

गुजरात के सौराष्ट्र में अरब सागर के तट पर स्थित प्रभास पाटन में 'सोमनाथ ज्योतिर्लिंग' विराजमान है। यह भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहला और अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस मंदिर की उत्पत्ति की कथा चंद्र देव (सोम) के अहंकार, उन्हें मिले भयंकर श्राप और भगवान शिव की अपार करुणा से जुड़ी है।

चंद्र देव का विवाह और रोहिणी के प्रति मोह
शिव पुराण की कथा के अनुसार, प्रजापति दक्ष ने अपनी 27 सुंदर कन्याओं (जो 27 नक्षत्रों की प्रतीक हैं) का विवाह चंद्र देव (Moon God) के साथ किया था। दक्ष को उम्मीद थी कि चंद्र देव उनकी सभी पुत्रियों को समान प्रेम और सम्मान देंगे। लेकिन चंद्र देव अपनी सभी पत्नियों में से केवल एक पत्नी 'रोहिणी' से सबसे अधिक प्रेम करते थे और उनके रूप के प्रति अत्यधिक आकर्षित थे। वे अपना सारा समय सिर्फ रोहिणी के साथ बिताते और बाकी 26 पत्नियों की पूरी तरह से उपेक्षा करते थे।

राजा दक्ष का क्रोध और भयंकर श्राप
अपने पति की इस लगातार उपेक्षा और पक्षपात से दुखी होकर बाकी 26 कन्याएं अपने पिता राजा दक्ष के पास गईं और रोते हुए अपना दुख प्रकट किया। प्रजापति दक्ष ने चंद्र देव को बुलाया और उन्हें समझाया कि वे अपनी सभी पत्नियों के साथ समान व्यवहार करें। लेकिन रोहिणी के प्रेम में पूरी तरह से अंधे हो चुके चंद्र देव ने दक्ष की चेतावनी को अनसुना कर दिया और अपना व्यवहार नहीं बदला।

अपनी पुत्रियों का यह लगातार अपमान देखकर राजा दक्ष अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने चंद्र देव को श्राप दे दिया कि, "जिस रूप, तेज और चमक पर तुम्हें इतना घमंड है, वह आज से ही क्षीण (नष्ट) होने लगेगा। तुम 'क्षय रोग' (wasting disease) से ग्रसित हो जाओगे और तुम्हारी सारी चमक समाप्त हो जाएगी।"

सृष्टि में हाहाकार और ब्रह्मा जी की सलाह
दक्ष के श्राप का असर तुरंत शुरू हो गया। चंद्र देव की चमक और आकार हर दिन कम होने लगा। चंद्रमा का प्रकाश क्षीण होने से पूरी सृष्टि का संतुलन बिगड़ गया। पृथ्वी पर रातों की शीतलता खत्म होने लगी, जड़ी-बूटियों और वनस्पतियों का विकास रुक गया और चारों ओर अंधकार और हाहाकार छाने लगा। घबराए हुए सभी देवता और अपनी चमक खो चुके चंद्र देव मदद के लिए भगवान ब्रह्मा के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी ने उन्हें बताया कि दक्ष का श्राप पूरी तरह से नष्ट तो नहीं किया जा सकता, लेकिन यदि चंद्र देव प्रभास तीर्थ में जाकर भगवान शिव (मृत्युंजय) की कठोर तपस्या करें, तो केवल वही इस संकट से उबार सकते हैं।

प्रभास क्षेत्र में चंद्र देव की कठोर तपस्या
ब्रह्मा जी की सलाह मानकर चंद्र देव प्रभास क्षेत्र (वर्तमान सोमनाथ) पहुंचे। वहां उन्होंने समुद्र के किनारे अपने हाथों से एक शिवलिंग की स्थापना की और लगातार छह महीने तक एक पैर पर खड़े होकर महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए भगवान शिव की घोर तपस्या की।

भगवान शिव का वरदान और सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना
चंद्र देव की सच्ची भक्ति और कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। शिव जी ने कहा कि दक्ष का श्राप पूरी तरह से मिटाया नहीं जा सकता, इसलिए उन्होंने एक बीच का रास्ता निकाला और चंद्र देव को वरदान दिया।

शिव जी ने कहा, "महीने के 15 दिन (कृष्ण पक्ष) तुम्हारी चमक श्राप के कारण धीरे-धीरे कम होगी और अमावस्या को तुम पूरी तरह क्षीण हो जाओगे, लेकिन मेरे वरदान के प्रभाव से अगले 15 दिन (शुक्ल पक्ष) तुम्हारी चमक फिर से बढ़ने लगेगी और पूर्णिमा के दिन तुम अपने पूर्ण तेज के साथ चमकोगे।"

इस प्रकार भगवान शिव ने चंद्र देव को उनके क्षय रोग और श्राप के विनाशकारी प्रभाव से बचा लिया। श्राप से मुक्त होने और अपना तेज वापस पाने के बाद, चंद्र देव (और अन्य देवताओं) ने शिव जी से प्रार्थना की कि वे ब्रह्मांड के कल्याण के लिए हमेशा के लिए इसी स्थान पर निवास करें।

भगवान शिव ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली और उसी शिवलिंग में ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हो गए। चूंकि चंद्र देव का एक नाम 'सोम' भी है और भगवान शिव ने उनके 'नाथ' (रक्षक) के रूप में उनकी रक्षा की थी, इसलिए इस ज्योतिर्लिंग का नाम "सोमनाथ" (अर्थात सोम या चंद्रमा के नाथ) पड़ा। चंद्र देव ने यहाँ भगवान शिव के लिए सोने (Gold) का एक भव्य मंदिर बनवाया था, जिसे सोमनाथ मंदिर का सबसे पहला स्वरूप माना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल