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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी: श्री हरि के पूर्ण अवतार का दिव्य प्राकट्य

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भगवान विष्णु के आठवें अवतार, जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पावन पर्व है। यह त्योहार अधर्म के विनाश, धर्म की स्थापना और प्रेम का संदेश देने के लिए मनाया जाता है। मथुरा-वृंदावन, गोकुल और देश-विदेश के प्रमुख कृष्ण मंदिरों में इस अवसर पर अद्वितीय उल्लास देखने को मिलता है। श्रद्धालु पूरे दिन उपवास रखते हैं और मध्यरात्रि—भगवान के जन्म के शुभ मुहूर्त—में निशिता काल अभिषेक, महाआरती और माखन-मिश्री के भोग के साथ जन्मोत्सव मनाते हैं। दही हांडी प्रतियोगिताएँ, भव्य झांकियाँ और मंदिरों की अलौकिक सजावट इस पर्व की दिव्यता में चार चांद लगाती हैं।

मुख्य परंपराएं एवं जन्माष्टमी के प्रमुख आकर्षण

  • मध्यरात्रि निशिता काल अभिषेक: रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि में रात 12 बजे बाल गोपाल का दूध, दही, शहद, घी और गंगाजल (पंचामृत) से भव्य जलाभिषेक किया जाता है।

  • दही हांडी और मटकी फोड़ उत्सव: भगवान कृष्ण की बाल-लीलाओं और माखन चोरी का स्मरण करते हुए 'गोविंदा' मानव पिरामिड बनाकर हवा में लटकी माखन की मटकी तोड़ते हैं।

  • व्रत, कीर्तन एवं भगवद गीता पाठ: श्रद्धालु दिनभर निर्जला या फलाहार व्रत रखते हैं। मंदिरों में 'हरे कृष्णा' महामंत्र का अखंड संकीर्तन और गीता का पाठ होता है।

  • भव्य झांकियां एवं झूलनोत्सव: श्रीकृष्ण के जीवन की प्रमुख लीलाओं की आकर्षक सजीव झांकियां सजाई जाती हैं और मंदिरों में लड्डू गोपाल को रेशमी पालने (झूले) में झुलाया जाता है।

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    आध्यात्मिक महत्व एवं श्रीकृष्ण के अमर संदेश
    आधुनिक जीवन के लिए भगवान श्रीकृष्ण की शाश्वत सीख
  • धर्म की स्थापना: श्रीकृष्ण का अवतार अधर्म का नाश कर धर्म की पुनः स्थापना का प्रतीक है, जो संदेश देता है कि सत्य की हमेशा विजय होती है।

  • कर्मयोग का सिद्धांत: श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से भगवान ने निष्काम कर्म का पाठ पढ़ाया—अर्थात फल की चिंता किए बिना केवल अपने कर्तव्य का पूरी निष्ठा से पालन करना।

  • निश्छल भक्ति और प्रेम: श्री हरि की लीलाएं सिखाती हैं कि ईश्वर को पाने का सबसे सरल मार्ग सच्चा प्रेम, समर्पण और अनन्य भक्ति है।

  • मानव जीवन के लिए मार्गदर्शन: श्रीकृष्ण की सीख व्यक्ति को मानसिक संतुलन, विषम परिस्थितियों में साहस और सही-गलत का निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करती है।

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    भारत के प्रमुख मंदिर विभिन्न राज्यों में फैले हुए हैं।

    कारागार में हुआ अलौकिक अवतार: श्रीकृष्ण जन्म की पावन कथा

    जन्माष्टमी की यह पौराणिक कथा मथुरा के अत्यंत क्रूर राजा कंस के उस अंधियारे कारागार से आरंभ होती है, जहाँ उसने अपनी बहन देवकी और उनके पति वसुदेव को बंदी बना रखा था। एक आकाशवाणी ने कंस को सचेत किया था कि देवकी की आठवीं संतान उसका वध करेगी। काल के भय से भयभीत कंस ने देवकी की पहली छह संतानों का निर्दयता से अंत कर दिया, जबकि सातवें गर्भ के रूप में श्री बलराम जी को योगमाया द्वारा गोकुल में रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया गया।

    भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की आधी रात को, जब घनघोर घटाएँ घिरी थीं और मूसलाधार वर्षा हो रही थी, भगवान विष्णु स्वयं अपने चतुर्भुज रूप में देवकी और वसुदेव के समक्ष प्रकट हुए। प्रभु ने वसुदेव जी को आदेश दिया कि वे उन्हें तुरंत गोकुल में नंदबाबा के यहाँ पहुँचा दें और स्वयं एक नवजात शिशु का रूप धारण कर लिया। तभी एक चमत्कार हुआ—वसुदेव जी के हाथों की लोहे की बेड़ियाँ खुल गईं, कारागार के प्रहरी गहरी निद्रा में सो गए और बंद दरवाजे स्वयं ही खुलते चले गए।

    वसुदेव जी नन्हे कृष्ण को बाँस की एक टोकरी में रखकर अपने सिर पर उठाए उफनती यमुना नदी की ओर बढ़ चले। अपने स्वामी का स्पर्श पाने के लिए यमुना का जल स्तर बढ़ने लगा और जैसे ही उसने बाल कृष्ण के चरण कमलों को स्पर्श किया, नदी ने शांत होकर वसुदेव जी को मार्ग दे दिया। शेषनाग ने अपने अनेक फणों से टोकरी पर छत्र बनाकर मूसलाधार बारिश से प्रभु की रक्षा की। गोकुल पहुँचकर वसुदेव जी ने कृष्ण को यशोदा मैया के पास सुला दिया और वहाँ जन्मी योगमाया (कन्या) को लेकर पुनः मथुरा लौट आए। इस प्रकार, विपत्तियों के बीच धर्म की रक्षा के लिए भगवान श्रीकृष्ण का अलौकिक प्राकट्य हुआ।

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    कारागार में हुआ अलौकिक अवतार: श्रीकृष्ण जन्म की पावन कथा
    अलौकिक बाल-लीलाएँ एवं कंस वध की कथा

    अलौकिक बाल-लीलाएँ एवं कंस वध की कथा

    माता यशोदा और नंदबाबा के वात्सल्य की छाया में गोकुल और वृंदावन की गलियों में बड़े होते हुए श्रीकृष्ण ने अपनी लीलाओं से सभी का मन मोह लिया। 'माखनचोर' के रूप में प्रसिद्ध बाल गोपाल ने अपनी नटखट हरकतों से हर घर में आनंद भर दिया। जब भी राजा कंस ने पूतना, तृणावर्त या बकासुर जैसे शक्तिशाली राक्षसों को उनका वध करने भेजा, बाल कृष्ण ने लीला ही लीला में उनका अंत कर दिया।

    जब भयंकर विषैले नाग कालिया ने यमुना के जल को जहरीला बना दिया, तो श्रीकृष्ण ने नदी में कूदकर कालिया नाग का मर्दन किया और उसके फणों पर दिव्य नृत्य करके यमुना जल को पुनः पवित्र कर दिया। इसी तरह, देवराज इंद्र के अहंकार को तोड़ने और मूसलाधार बारिश से ब्रजवासियों की रक्षा करने के लिए, केवल सात वर्ष की आयु में श्रीकृष्ण ने विशाल गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका (छोटी) उंगली पर धारण कर लिया था।

    किशोरावस्था में प्रवेश करते ही श्रीकृष्ण आकाशवाणी के वचन को पूर्ण करने मथुरा पहुंचे। कंस के विशालकाय मल्ल योद्धाओं और मदमस्त हाथी कुवलयापीड़ का अंत करते हुए प्रभु सीधे कंस के महल पहुंचे। श्रीकृष्ण ने पापी कंस का वध कर उसके अत्याचारों का अंत किया, अपने माता-पिता देवकी और वसुदेव को कारागार से मुक्त कराया तथा धर्म की पुनः स्थापना की।

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