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After the devastating Kurukshetra war, the Pandavas sought Lord Shiva to cleanse their sins of killing their own kin. Shiva, unwilling to forgive them easily, disguised himself as a bull, and when Bhima tried to capture him, the bull sank into the ground leaving only its hump behind to be worshipped.

काशी विश्वनाथ मंदिर की पौराणिक कथा: अनंत प्रकाश स्तंभ का रहस्य

काशी (वाराणसी) को भगवान शिव की सबसे प्रिय नगरी माना जाता है। शिव पुराण के अनुसार, यह पूरी नगरी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी हुई है। यहीं पर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, श्री काशी विश्वनाथ विराजमान हैं। इस पवित्र ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति की कहानी ब्रह्मांड के सबसे बड़े विवाद और भगवान शिव के परम रूप से जुड़ी है।

ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता का विवाद
सृष्टि के आरंभिक काल की बात है। एक बार भगवान ब्रह्मा (सृष्टि के रचयिता) और भगवान विष्णु (सृष्टि के पालनहार) के बीच इस बात को लेकर भयंकर विवाद उत्पन्न हो गया कि ब्रह्मांड में सबसे श्रेष्ठ और शक्तिशाली कौन है। दोनों ही स्वयं को परम सत्ता मान रहे थे। यह विवाद इतना उग्र हो गया कि इससे पूरे ब्रह्मांड का संतुलन बिगड़ने लगा और चारों ओर हाहाकार मच गया।

अनंत अग्नि स्तंभ (ज्योतिर्लिंग) का प्रकटीकरण
देवताओं की चिंता को देखते हुए और ब्रह्मा तथा विष्णु का अहंकार तोड़ने के लिए, अचानक उन दोनों के बीच एक बेहद विशाल और भयंकर आग का स्तंभ (Pillar of Fire) प्रकट हुआ। यह प्रकाश स्तंभ इतना विशाल था कि इसका न तो कोई आदि (शुरुआत) दिख रहा था और न ही कोई अंत। यह तीनों लोकों को चीरता हुआ अनंत तक फैला हुआ था।

तभी उस स्तंभ से एक आकाशवाणी हुई कि आप दोनों में से जो भी इस अग्नि स्तंभ का छोर (अंत) सबसे पहले ढूंढ लेगा, वही सर्वश्रेष्ठ माना जाएगा।

छोर खोजने की चुनौती
चुनौती स्वीकार करते हुए दोनों ने अपनी यात्रा शुरू की:

  • भगवान विष्णु ने वराह (जंगली सूअर) का रूप धारण किया और स्तंभ का निचला हिस्सा (मूल) खोजने के लिए पाताल लोक की ओर धरती में गहरा खोदते हुए चले गए।

  • भगवान ब्रह्मा ने हंस का रूप धारण किया और स्तंभ का ऊपरी हिस्सा (शिखर) खोजने के लिए तीव्र गति से आकाश की ओर उड़ चले।

विष्णु का समर्पण और ब्रह्मा का छल
युगों तक पाताल में गहराई तक जाने के बाद भी भगवान विष्णु को उस प्रकाश स्तंभ का कोई अंत नहीं मिला। उन्हें यह आभास हो गया कि यह कोई साधारण अग्नि नहीं है, बल्कि यह एक अनंत और परम शक्ति है। अपनी हार स्वीकार करते हुए और पूरी विनम्रता के साथ विष्णु जी वापस उसी स्थान पर लौट आए।

दूसरी ओर, ऊपर की ओर उड़ते-उड़ते ब्रह्मा जी भी बुरी तरह थक चुके थे, लेकिन उनका अहंकार उन्हें हार मानने नहीं दे रहा था। तभी ऊपर से उन्हें एक केतकी का फूल नीचे गिरता हुआ दिखाई दिया। ब्रह्मा जी ने उस फूल से पूछा कि वह कहाँ से आ रहा है। फूल ने बताया कि वह युगों से इस स्तंभ के साथ नीचे गिर रहा है, लेकिन उसे इसका शिखर नहीं पता। ब्रह्मा जी ने केतकी के फूल को अपनी झूठी गवाही देने के लिए मना लिया।

वापस लौटकर ब्रह्मा जी ने विष्णु जी के सामने यह झूठा दावा किया कि उन्होंने स्तंभ का शिखर ढूंढ लिया है और केतकी के फूल ने भी उनकी इस बात की झूठी गवाही दे दी।

भगवान शिव का क्रोध और श्राप
ब्रह्मा जी का यह झूठ सुनते ही वह अनंत अग्नि स्तंभ अचानक फट गया और उसमें से भगवान शिव अपने प्रचंड और क्रोधित रूप में प्रकट हुए। शिव को देखकर दोनों देव समझ गए कि यह अग्नि स्तंभ कोई और नहीं, बल्कि स्वयं महादेव का 'ज्योतिर्लिंग' स्वरूप था।

भगवान शिव ने क्रोधित होकर ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि, "सृष्टि का रचयिता होने के बावजूद, आपने सत्य का मार्ग छोड़कर छल का सहारा लिया है। इसलिए, पृथ्वी पर कभी भी किसी मंदिर में आपकी पूजा नहीं की जाएगी।"

इसके बाद शिव जी ने झूठी गवाही देने वाले केतकी के फूल को भी श्राप दिया कि, "आज के बाद मेरी किसी भी पूजा या अनुष्ठान में केतकी का फूल कभी नहीं चढ़ाया जाएगा।"

वहीं, भगवान विष्णु की सत्यता और विनम्रता से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि विष्णु की पूजा शिव के समान ही पूरे ब्रह्मांड में सर्वोच्च रूप से की जाएगी।

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना
इस घटना के बाद, भगवान शिव ने ब्रह्मांड के कल्याण और अपने भक्तों पर कृपा बनाए रखने के लिए अपने उस अनंत प्रकाश (ज्योति) का एक अंश उसी स्थान पर स्थापित कर दिया। शिव का यही दिव्य प्रकाश अंश काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग कहलाया।

मान्यता है कि काशी में स्थित यह शिवलिंग संपूर्ण ब्रह्मांड का केंद्र है। यह भी कहा जाता है कि प्रलय काल में जब पूरी सृष्टि नष्ट हो जाएगी, तब भी काशी सुरक्षित रहेगी क्योंकि भगवान शिव इसे अपने त्रिशूल पर उठा लेंगे। जो भी मनुष्य काशी में अपने प्राण त्यागता है, भगवान शिव स्वयं उसके कान में 'तारक मंत्र' देते हैं और उसे जन्म-मरण के चक्र से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल