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माता लक्ष्मी का अवतार और भगवान श्री हरि विष्णु के संग परिणय

सनातन धर्म में माता लक्ष्मी को धन, वैभव, ऐश्वर्य, सौभाग्य और समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार महर्षि दुर्वासा के कोप के कारण देवराज इंद्र की असावधानी से त्रिपुंड और दिव्य माला का अनादर हो गया। इस शाप के प्रभाव से देवलोक की समस्त श्री, शोभा, धन और कांति समाप्त हो गई। तीनों लोक दरिद्रता और संकट के अंधकार में डूब गए।

अपनी खोई हुई समृद्धि को पुनः प्राप्त करने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु की आज्ञा से दैत्यों के साथ मिलकर 'समुद्र मंथन' का विशाल कार्य प्रारंभ किया। मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को नेती बनाया गया। जब देवताओं और असुरों ने क्षीर सागर को मथना शुरू किया, तो समुद्र के भीतर से 14 अलौकिक रत्न निकले।

हलाहल विष, कामधेनु गाय, उच्चैःश्रवा घोड़ा और ऐरावत हाथी के प्रकट होने के पश्चात, समुद्र की लहरों के बीच से एक अलौकिक, स्वर्णिम और अत्यंत सुंदर रूप का प्राकट्य हुआ। यह स्वयं 'माता लक्ष्मी' थीं।

माता लक्ष्मी हाथ में विकसित कमल का पुष्प लिए, दिव्य आभूषणों और लाल वस्त्रों में सुशोभित होकर हाथियों द्वारा किए जा रहे जलाभिषेक के बीच प्रकट हुईं। उनके प्रकट होते ही समस्त दिशाएं सुगंधित और कांतिमान हो गईं।

सभी देवता, गंधर्व और दैत्य माता लक्ष्मी की कृपा-दृष्टि पाने के लिए आतुर हो उठे। असुर चाहते थे कि लक्ष्मी जी उनके पास आएं और देवता भी उनकी आराधना करने लगे। परंतु माता लक्ष्मी ने अपने योग्य वर के चयन के लिए सभी देवों, ऋषियों और मुनियों को देखा। किसी के पास तप था तो क्रोध था, किसी के पास ज्ञान था तो त्याग की कमी थी।

अंततः, माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को देखा जो समस्त गुणों से युक्त, शांत, सर्वव्यापी और संसार के पालनहार थे। माता लक्ष्मी ने मंद मुस्कान के साथ अपने हाथों में ली हुई वैजयंती माला भगवान श्री हरि विष्णु के गले में पहना दी और उनके वक्षस्थल पर निवास किया।

माता लक्ष्मी के भगवान विष्णु का संग चुनते ही संपूर्ण ब्रह्मांड में खुशहाली लौट आई। देवलोक पुनः धन-धान्य और वैभव से परिपूर्ण हो गया।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल