माता वैष्णो देवी की पौराणिक कथा: धर्म की रक्षा और भैरवनाथ का उद्धार
जम्मू-कश्मीर की पवित्र त्रिकुटा पहाड़ियों में 5,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित माता वैष्णो देवी का दरबार भारत के सबसे सिद्ध और जागृत तीर्थस्थलों में से एक है। इस पवित्र गुफा में माता किसी मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि तीन प्राकृतिक पिंडियों (महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती) के रूप में विराजमान हैं। माता वैष्णो देवी की उत्पत्ति और भैरवनाथ के वध की कथा अत्यंत अद्भुत है।
त्रिशक्तियों का मिलन और वैष्णवी का जन्म
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय पृथ्वी पर पाप और दानवों का आतंक बहुत बढ़ गया था। धर्म की रक्षा के लिए परम शक्तियों—महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती—ने अपनी दिव्य ऊर्जाओं को मिलाया, जिससे एक अत्यंत तेजस्वी कन्या की उत्पत्ति हुई। देवियों ने उस कन्या को निर्देश दिया कि वह पृथ्वी पर जाकर भगवान विष्णु के अंश रूप में जन्म ले और धर्म की स्थापना करे। इस कन्या ने दक्षिण भारत में रत्नाकर सागर नामक एक परम भक्त के घर जन्म लिया और उनका नाम 'वैष्णवी' रखा गया।
बचपन से ही वैष्णवी का मन सांसारिक मोह-माया में नहीं था। वे हमेशा भगवान विष्णु के ध्यान में लीन रहती थीं। बड़ी होने पर उन्होंने त्रिकुटा पर्वतों की ओर जाकर घोर तपस्या करने का निर्णय लिया।
पंडित श्रीधर का भंडारा और भैरवनाथ का आगमन
कटरा (जम्मू) के पास हंसली गांव में माता का एक परम भक्त रहता था, जिसका नाम पंडित श्रीधर था। वह बहुत गरीब था लेकिन माता का सच्चा सेवक था। एक बार माता ने कन्या रूप में श्रीधर को दर्शन दिए और उसे पूरे गांव और आस-पास के साधु-संतों को भंडारे (महाभोज) का निमंत्रण देने को कहा। श्रीधर ने श्रद्धापूर्वक सबको बुला लिया, लेकिन उसे चिंता थी कि वह इतने लोगों को भोजन कैसे कराएगा।
भंडारे वाले दिन, कन्या रूपी वैष्णवी ने एक छोटे से जादुई बर्तन से हजारों लोगों को उनकी पसंद का भोजन परोसना शुरू कर दिया। इसी भंडारे में गुरु गोरखनाथ अपने कई शिष्यों के साथ आए थे, जिनमें से एक अत्यंत शक्तिशाली और अभिमानी तांत्रिक 'भैरवनाथ' था।
भैरवनाथ का अहंकार और माता की परीक्षा
जब वैष्णवी भैरवनाथ को भोजन परोसने गईं, तो उस अहंकारी तांत्रिक ने वैष्णवी की दिव्य शक्तियों को भांप लिया। उसने जानबूझकर माता से मांस और मदिरा की मांग की। वैष्णवी ने शांति से उत्तर दिया कि यह एक ब्राह्मण का शुद्ध भंडारा है, यहाँ यह सब नहीं मिलेगा। लेकिन भैरवनाथ अपनी जिद पर अड़ा रहा और उसने वैष्णवी को पकड़ने की कोशिश की।
यह देखकर माता वहाँ से अंतर्ध्यान हो गईं और त्रिकुटा पहाड़ियों की ओर चल पड़ीं। भैरवनाथ अपनी तांत्रिक शक्तियों के बल पर माता का पीछा करने लगा।
त्रिकुटा पर्वत की यात्रा और चमत्कार
माता जब पहाड़ियों की ओर जा रही थीं, तो रास्ते में उन्होंने कई चमत्कार किए जो आज मुख्य दर्शन स्थल हैं:
बाणगंगा: रास्ते में जब माता के साथ चल रहे वीर लंगूर को प्यास लगी, तो माता ने धरती पर एक तीर (बाण) मारा, जिससे जल की एक निर्मल धारा फूट पड़ी। माता ने यहाँ अपने केश भी धोए थे।
चरण पादुका: एक स्थान पर माता रुकीं और मुड़कर देखा कि भैरवनाथ आ रहा है या नहीं। आज भी उस पत्थर पर माता के पैरों के निशान मौजूद हैं।
अर्धकुंवारी (गर्भजून गुफा): माता एक संकरी गुफा में प्रवेश कर गईं और वहां पूरे 9 महीने तक शिव का ध्यान किया, ठीक वैसे ही जैसे एक शिशु माता के गर्भ में 9 महीने रहता है। इसलिए इसे 'गर्भजून' कहा जाता है।
भैरवनाथ का वध और उसे क्षमादान
नौ महीने बाद भैरवनाथ उस गुफा के द्वार तक पहुंच गया। उसने गुफा के बाहर पहरा दे रहे वीर लंगूर से युद्ध किया। जब भैरवनाथ ने गुफा में प्रवेश करने की कोशिश की, तो माता वैष्णवी ने गुफा के दूसरे छोर को अपने त्रिशूल से तोड़कर बाहर का रास्ता बना लिया।
गुफा से बाहर आकर माता ने अपना सौम्य रूप त्याग दिया और 'महाकाली' का अत्यंत रौद्र और भयानक रूप धारण कर लिया। माता ने अपने त्रिशूल से भैरवनाथ पर ऐसा प्रहार किया कि उसका सिर धड़ से अलग होकर कुछ किलोमीटर दूर एक दूसरी पहाड़ी की चोटी पर जा गिरा (जहां आज भैरो मंदिर है)।
माता का परम वरदान
मृत्यु के समय भैरवनाथ का सारा अहंकार टूट गया। उसे एहसास हुआ कि वह साक्षात जगदम्बा से युद्ध कर रहा था। उसने रोते हुए माता से अपने पापों की क्षमा मांगी और कहा कि आने वाली पीढ़ियां उसे केवल एक पापी राक्षस के रूप में याद रखेंगी।
माता वैष्णो देवी अत्यंत दयालु थीं। उन्होंने भैरवनाथ को न केवल क्षमा किया, बल्कि उसे जन्म-मरण के चक्र से मुक्त कर दिया। साथ ही माता ने उसे यह वरदान दिया कि, "मेरे दर्शनों के लिए आने वाले किसी भी भक्त की तीर्थयात्रा तब तक पूरी नहीं मानी जाएगी, जब तक वह मेरे बाद तुम्हारे (भैरवनाथ) दर्शन नहीं करेगा।"
इसके बाद माता वैष्णवी ने 3 प्राकृतिक चट्टानों (पिंडियों) का रूप धारण कर लिया और सदा के लिए उस परम पावन गुफा में ध्यानमग्न हो गईं। आज भी लाखों भक्त "जय माता दी" के जयकारों के साथ माँ के दरबार में हाजिरी लगाने जाते हैं।