The Birth of Lord Krishna
The Triumph of Cosmic Love over Darkness and Tyranny
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गोकुल की गलियों में भोर की पहली किरण पड़ते ही माखन मथने की सुमधुर ध्वनि गूंजने लगती थी। पूरा गांव खुशहाल था, पर गोकुल की गोपियाँ अपनी मटकियों को ऊँचे छीकों पर छिपाकर रखती थीं। कारण थे—मैया यशोदा के नटखट लल्ला, बाल कृष्ण! गोकुल में उन्हें सब प्यार से 'माखनचोर' कहते थे। मोरपंख धारण किए और आँखों में असीम चंचलता लिए कान्हा को माखन बेहद प्रिय था, लेकिन माखन से भी अधिक प्रिय था गोपियों का निष्छल प्रेम।
एक दोपहर, जब मैया यशोदा घर के कामों में व्यस्त थीं, कान्हा ने अपने सखाओं की मंडली जमा की। वे चुपके से पड़ोसी गोपी के घर में घुसे और एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर मानव मीनार बना ली। कान्हा ने ऊपर टंगी मटकी को फोड़ दिया और स्वयं माखन खाने के साथ-साथ अपने सखाओं और बंदरों में भी बांटने लगे। तभी दरवाजे पर मैया यशोदा आ खड़ी हुईं। कान्हा के सखा तो भाग खड़े हुए, पर मैया ने कान्हा की कलाई थाम ली।
रोज-रोज की शिकायतों से तंग आकर मैया ने कान्हा को थोड़ा डराने और एक जगह बांधकर रखने का निश्चय किया। वे आंगन से एक भारी उखल (ओखली) ले आईं और उसे एक मजबूत रस्सी से बांधने लगीं।
परंतु, जैसे ही मैया ने कान्हा की कमर पर रस्सी लपेटी, रस्सी ठीक दो अंगुल छोटी पड़ गई। मैया ने मुस्कुराते हुए दूसरी रस्सी जोड़ी, पर आश्चर्य! इस बार भी रस्सी दो अंगुल छोटी ही रह गई। मैया घर की सारी रस्सियां ले आईं और एक-दूसरे से बांधती गईं, लेकिन हर बार रस्सी ठीक दो अंगुल ही कम पड़ती। पूरा गोकुल यह अद्भुत लीला देखकर चकित था।
वास्तव में, वे दो अंगुल मनुष्य के 'अहंकार' और 'प्रयास' का प्रतीक थे। जो संपूर्ण ब्रह्मांड को अपने भीतर समेटे हुए हैं, उन परमपिता परमेश्वर को कोई भी भौतिक शक्ति या बल से कैसे बांध सकता था?
जब कान्हा ने देखा कि उनकी मैया पसीने से लथपथ हो चुकी हैं और थककर उदास हो गई हैं, तो प्रभु का हृदय पिघल गया। मैया के उस निस्वार्थ और अनन्य वात्सल्य प्रेम के आगे भगवान ने स्वयं को उस छोटी सी रस्सी से बंधने दिया।
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