श्री जगद्गुरु कृपालु जी महाराज की दिव्य परिकल्पना
सफेद संगमरमर पर उकेरा गया राधा-कृष्ण के निष्छल प्रेम और स्थापत्य कला का अद्भुत संगम
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एक समय की बात है, समस्त देवी-देवताओं के बीच इस बात को लेकर एक बड़ा विवाद छिड़ गया कि पृथ्वी पर सबसे पहले किसकी पूजा होनी चाहिए। देवराज इंद्र, अग्निदेव, वायुदेव और कार्तिकेय सहित सभी देवता स्वयं को सर्वश्रेष्ठ और 'प्रथम पूज्य' पद का अधिकारी मान रहे थे। जब यह ज्ञानी सभा किसी निर्णय पर नहीं पहुँच सकी, तो सभी देव न्याय के लिए भगवान शिव और माता पार्वती के पास कैलाश पर्वत पहुँचे।
समस्या का समाधान निकालने के लिए महादेव ने एक धर्मसंगत प्रतियोगिता का आयोजन किया। शिवजी ने घोषणा की, "आप सभी में से जो भी अपने वाहन पर सवार होकर इस संपूर्ण ब्रह्मांड की तीन बार सबसे पहले परिक्रमा करके वापस कैलाश लौटेगा, वही संसार में 'प्रथम पूज्य' माना जाएगा।"
यह सुनते ही सभी देवता अपने-अपने तीव्रगामी वाहनों पर सवार होकर ब्रह्मांड की परिक्रमा के लिए उड़ चले। माता पार्वती और शिव के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय भी बिना समय गंवाए अपने द्रुतगामी वाहन मयूर (मोर) पर सवार होकर अंतरिक्ष की ओर निकल पड़े।
परंतु, माता पार्वती और शिव के छोटे पुत्र श्री गणेश शांत भाव से वहीं खड़े रहे। उनका वाहन एक छोटा सा मूषक (चूहा) था और उनका शरीर लंबोदर (बड़ा पेट वाला) था। अपनी धीमी गति और मूषक की सीमा जानते हुए भी गणेश जी के चेहरे पर तनिक भी चिंता नहीं थी। उन्होंने मुस्कुराते हुए अपनी कुशाग्र बुद्धि का प्रयोग किया।
श्री गणेश ने अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ माता पार्वती और पिता शिव को एक साथ एक दिव्य आसन पर बैठाया। इसके बाद, उन्होंने भक्ति भाव से जल अर्पित किया और अपने माता-पिता के चरण स्पर्श करके उनकी तीन बार विनम्रतापूर्वक परिक्रमा की। परिक्रमा पूर्ण कर वे हाथ जोड़कर प्रभु के समक्ष खड़े हो गए।
जब सभी देवता पूरे ब्रह्मांड का चक्कर लगाकर थके-हारे कैलाश वापस लौटे, तो वे गणेश जी को पहले से वहाँ विश्राम करते देख आश्चर्यचकित रह गए। कार्तिकेय ने पूछा कि बिना परिक्रमा किए वे विजयी कैसे हो सकते हैं?
तब गणेश जी ने अत्यंत नम्रता से कहा, "शास्त्रों के अनुसार, माता-पिता का स्थान संपूर्ण ब्रह्मांड से भी ऊंचा है। माता में संपूर्ण पृथ्वी और पिता में संपूर्ण आकाश का वास होता है। इसलिए अपने पूज्य माता-पिता की परिक्रमा करना ही समस्त ब्रह्मांड की परिक्रमा करने के समान है।"
गणेश जी की यह अद्भुत बुद्धि, दूरदर्शिता और माता-पिता के प्रति अगाध प्रेम देखकर महादेव और माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुए। शिवजी ने उन्हें गले से लगाया और वरदान दिया कि किसी भी मांगलिक कार्य, पूजा या अनुष्ठान में सबसे पहले श्री गणेश की ही पूजा की जाएगी।
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