Lord Hanuman & The Swallowing of the Sun
The adventurous childhood story of the monkey god Hanuman leaping into space to swallow the sun, thinking it was a ripe fruit.
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पूर्व जन्म में माता सती के रूप में अपने प्राणों की आहुति देने के पश्चात, जगदंबा ने पर्वतराज हिमालय और माता मैना के घर में कन्या रूप में जन्म लिया। पर्वतराज की पुत्री होने के कारण उन्हें 'पार्वती' और 'शैलपुत्री' कहा गया। बाल्यावस्था से ही पार्वती जी के मन में भगवान शिव के प्रति अनन्य भक्ति रची-बसी थी। वे अपने पूर्वजन्म के स्वामी महादेव को ही पुनः अपने पति के रूप में पाना चाहती थीं।
परंतु, सती के वियोग में भगवान शिव संसार से विरक्त होकर कैलाश पर्वत पर घोर समाधि में लीन थे। उन्हें समाधि से जगाना और उनके वैरागी मन में पुनः गृहस्थ जीवन के प्रति प्रेम जगाना अत्यंत असंभव कार्य था। जब देवर्षि नारद ने पार्वती जी को बताया कि केवल कठोर तपस्या के बल पर ही वे महादेव को प्रसन्न कर सकती हैं, तो राजकुमारी पार्वती ने अपने राजसी वस्त्र, आभूषण और राजप्रासाद के समस्त सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया।
माता पार्वती तपस्या के लिए घने जंगलों में चली गईं। उन्होंने हजारों वर्षों तक जल और अन्न का त्याग कर कठोर व्रत रखे। कड़ाके की ठंड, भयंकर गर्मी और मूसलाधार बारिश में भी वे अविचल रहकर केवल 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करती रहीं।
तपस्या के अंतिम चरणों में उन्होंने वृक्षों से गिरने वाले सूखे पत्तों को भी खाना छोड़ दिया, जिसके कारण शास्त्रों में उनका एक नाम 'अपर्णा' पड़ा। उनकी इस अभूतपूर्व और कठिन साधना को देखकर तीनों लोकों में हाहाकार मच गया।
पार्वती जी की निष्ठा की परीक्षा लेने स्वयं भगवान शिव सप्त ऋषियों के साथ छद्म रूप में पहुँचे और शिवजी की बुराई करने लगे। परंतु, पार्वती जी ने अडिग रहते हुए कहा, "मेरा मन केवल महादेव के चरणों में समर्पित है, चाहे वे अघोरी हों या दिगंबर।"
माता पार्वती के इस निश्चल प्रेम, अटूक भक्ति और अटूट समर्पण को देखकर भगवान शिव की समाधि टूट गई। महादेव स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने पार्वती जी का हाथ थामकर कहा, "हे पार्वती! तुम्हारी तपस्या से मैं पराजित हो गया हूँ। आज से मैं तुम्हारा दास हूँ।" इसके पश्चात शिव और पार्वती का पावन विवाह संपन्न हुआ।
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